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डूबती कश्ती

चाहत के समंदर में वो डूबती कश्ती तूने उससे चुल्लू भर पानी हटाया नहीं। कश्ती और पानी के रिश्ते को शायद, तुम समझ पायी नहीं या मैं समझ पाया नहीं। मैं हर बार लोटा भर बाहर उड़ेलता और तुम हो कि कश्ती को छेदती जा रही। छेदों से  कश्ती छलनी होती जा रही अब मैं थक गया हूँ, इस कश्ती को बचाते बचाते। 11:00 AM १२/०९/२०१९

हटके से कर

ठान ले अपनी मंजिल क्या है? जान ले अपनी राहें क्या है? कहाँ पे तू भटका है बुद्धू ? पूछ ज़रा दिल चाहे क्या ये? बन मत तू बचकाना, मन को न भटकाना, चुन ले उन राहों को, जिन राहों पे तुझको जाना, किन अँधियारों में भटका है ? तेरे दिल में कुछ तो खटका है।  तू अटका है , तू भटका है। लगता है थोड़ा सटका है।  झटके से उठ, हटके से कर, हिम्मत से काम ले, भटका न कर, मुश्किल से पल्लू  झटका न कर तू अटका न कर, तू लटका न कर  जिंदगी में हार कर  सर पटका न कर रे.......  और सुन.........  जो मुश्किल का तुझे मटका दे।  उसे अपने नीचे लटका दे।  दे कान के निचे तपड़ी, उसको पूरा ही तू सटका दे, हाँ झटका दे, हाँ फटका दे, उसको सूली पर अटका दे।  माहौल गरम हो  तो शांत हो जाओ, जब सर ज़रा चकराए  तो एकांत हो जाओ।  पर मत भूल ! तुने कुछ ठाना है।  मंजिल जरा दूर है।  राहों में चलते जाना है।  कभी फटे में पैर न फ़साना। क्योंकि अपनी राहें है.........   बहुत हार्...

वसन्त

वसन्त यह अरसा बदल रहा है , यह सरसा बन रहा है। यह अपने तन - ज़हन में , सिहरन सा भर रहा है। मैं रहकर इसके आँचल में , खुशियाँ गा रहा हूँ। कागज के कोरे पन्ने पर मैं लिखता जा रहा हूँ। । 1 ।। सुमनों के सुंदर साये में , पेड़ों की पावन छाया में , मैं बैठा हूँ अकेला , हूँ उनसे मिलने आया मैं। पंख लगा उद्भावना के , मैं उड़ता जा रहा हूँ। कागज के कोरे पन्ने पर मैं लिखता जा रहा हूँ। । 2 ।। दॄष्टि डाली दूर तलक , इस फलक से उस फलक , दिख रहा है अलग थलग , छू रहा यह दिल तलक , बैठ करके गीत भ्रमर के , मैं गुन गुना रहा हूँ। कागज के कोरे पन्ने पर मैं लिखता जा रहा हूँ। । 3 ।। कहीं नीमौली निवड़ रही हैं , कहीं मंजरी फूट रही। वृक्षों की टहनी पर देखो , कोमल कलियाँ छूट रही। विलोक्यकर मैं विचित्र द़ृश्य , चित्र इसका बना रहा हूँ। कागज के कोरे पन्ने पर मैं लिखता जा रहा हूँ। । 4 ।। न सर्दी हमको कंपा रही , न गर्मी हमको तपा रही। मैँ उल्फत की बगिय...

चलती फिरती यादें

वो चलती फिरती यादें तेरी, जब भी ज़हन में आती है, दिल धड़कना रुक जाता है और सांसें ही थम जाती है। वो तेरी ज़ुल्फ़ों की छाया , प्रेम ख़ूब बरसाती है। वो तेरे हाथों की छुअन, तन में सिहरन लाती है। कभी ख़ुशी दे जाती है तो कभी रुलाके जाती है। वो चलती फिरती यादें तेरी, जब भी ज़हन में आती है। तेरे संग बिताये लम्हें और तेरी शरारतें मुझे रिजाती है, लेकिन सारे खुशियों के क्षण, मेरी तन्हाई खा जाती है।... फिर एक ही राह बचती है। तेरे नम्बर पर घंटी जाती है। वो चलती फिरती यादें तेरी, जब भी ज़हन में आती है। ---Hariram Regar #SundayPoetry With Hariram Regar vo chalati phirati yaaden teri,  jab bhi zahan mein aati hai,  dil dhadakana ruk jaata hai  aur saansen hi tham jaati hai.  vo teri zulfon ki chhaaya ,  prem khoob barasaati hai.  vo tere haathon ki chhuan,  tan mein siharan laati hai.  kabhi khushi de jaati hai to  kabhi rulaake jaati hai.  vo chalati phirati yaaden teri,...

बचाए धरती मात को

बचाए धरती मात को होम हो रहा है धरती का , प्रदूषण ने डाला डेरा । मानव के कुकर्मों   का , फैला है चहुँ और अँधेरा । बदलो अपनी आदत को , समझाओ मानव जात को। आओ हम सब मिलके बचाए , अपनी धरती मात को। । 1 ।। कुछ वर्षों   से धरती माता , दुःख - कष्टों में पड़ी है । अब नहीं सहन कर सकती है , यह विनाश कगारे खड़ी है । अगर सुख से जीना चाहो , रोको दुःख की रात को । आओ हम सब मिलके बचाए , अपनी धरती मात को। । 2 ।। सुख के साधन हमने , तुमने खोजे , कर लिया सुख का आभास । इतना सा सुख ढेरों दुःख देगा , कर देगा हमारा विनाश । हम अपना तो भला सोचें , पर न आने दे विनाश की वात को । आओ हम सब मिलके बचाए , अपनी धरती मात को। । 3 ।। नहीं विरासत में मिली हमें यह , लिया पूर्वजों से उधार हमने । क्या देंगें हम भावी पीढ़ी को ? अगर किया इसे बीमार हमने । सोचो अपने मन ही मन , और उत्तरित करो इस बात को । आओ हम सब मिलके बचाए , अपनी ...

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असमंजस (Confusion) | Poem | By Hariram Regar

🌿 असमंजस – जब निर्णय कठिन हो हम सबके जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जहाँ मन अनेक दिशाओं में भटकता है। निर्णय लेना आसान नहीं होता, और असमंजस की स्थिति हमें बाहरी सुंदरता और भीतरी भ्रम के बीच झुला देती है। इसी मनःस्थिति को गहराई से चित्रित करती है Hariram Regar की यह मार्मिक कविता – "असमंजस" । यह कविता केवल सुंदर शब्दों की माला नहीं है, बल्कि यह संकोच, संशय और आत्मबोध की यात्रा है। आइए पढ़ते हैं यह सुंदर और विचारोत्तेजक काव्य: असमंजस (Confusion) तकते रहोगे बाग को तुम , कब तलक तकते रहोगे ? बीतते पल-पल दिवस, ये फूल मुरझा जायेंगे। मन की इन गहराइयों में प्रश्न अगणित जाल-से । फूल है या भ्रम की छाया पूछते हर डाल से। बीतते पल गीत जैसे, रूठ जायेंगे अगर । निर्णय की इस मौन बेला में चलो अब संगधर । त्याग दो संकोच सारे, संशयों को आज तुम । मन कहे जो सत्य बोले, सुन लो वो अव्यक्त गुण। अब ना तकना शेष हो यह — पथ सुनिश्चित जान लो। जो बसा है चित्त-गहर में, अब उसे ही मान लो। Composed by: Hariram Regar 🧠 कविता का मर्म – असमंजस से आत्म-निर्णय तक इस कविता में बाग   प्रतीक है उन आकर्षक ...

हम गाँव के देसी छोरे हैं – गांव की मिट्टी से जुड़ी हिंदी कविता | By Hariram Regar

गाँव की मिट्टी का महत्व और उसकी महक भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है। चाहे हम कितने ही आधुनिक हो जाएँ, गाँव की मिट्टी की सौंधी खुशबू और वहाँ की सरलता का कोई मुकाबला नहीं है। गाँवों का जीवन, प्रकृति के साथ सामंजस्य और वहाँ के लोगों का मेहनत से भरा हुआ जीवन, हर किसी को सिखाता है कि सादगी में ही असली ख़ुशी है। हिंदी कविता, जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, ग्रामीण जीवन को बहुत अच्छे से चित्रित करती है। इसी क्रम में हरिराम रेगर  द्वारा रचित कविता "हम गाँव के देसी छोरे हैं" एक ग्रामीण जीवन का अद्भुत चित्रण है। इस कविता में न केवल गाँव की संस्कृति को, बल्कि वहाँ के लोगों की मेहनत, मिट्टी के प्रति लगाव, और जीवन के प्रति उनके सकारात्मक दृष्टिकोण को भी बखूबी दर्शाया गया है। यह कविता गाँव की सरलता और वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य के बीच रहने वाले लोगों की भावनाओं को अभिव्यक्त करती है। हम गाँव के देसी छोरे हैं – कविता खेतों में दौड़ें पग नंगे, मिट्टी में बसती जान अपनी। बाबा के संग बैल जोते थे, सींची थी प्यार से धान अपनी। नदियाँ, बगिया, जंगल, पहाड़, हर दृश्य यहाँ स...

क्यों अँधकार में बैठे हो ? kyo andhakaar me baithe ho ? By Hariram Regar

  ©मुझको जो कहना था वो तो उस  दिन ही सब कह डाला।  अब तुझको भी कुछ कहना हो तो  जल्दी से तुम कह डालो।  कुछ कौड़ी जो है जेब में तेरे  क्या उस पर ही तुम ऐंठे हो ? कुछ बात करो कुछ निर्णय लो  क्यों अँधकार  में बैठे हो ? कुछ राग रहा हो और अगर  वो राग भी तुम अब कह डालो।  और आग भरी हो सीने में तो  उसको भी तुम बाहर निकालो।  क्यों रोज रोज ही खटपट हो  क्यों रोज रोज ही टें-टें  हो? कुछ बात करो कुछ निर्णय लो  क्यों अँधकार  में बैठे हो ? कब तक हाँकोगे उसको? इसकी समय अवधि भी निश्चित है? अरे हाय ! तुम्हारी बेशर्मी  मेरे गाँव में तो ये चर्चित है।  वो बने तुम्हारे आदर्शी  तुम बने उसके घुसपैठे हो।  कुछ बात करो कुछ निर्णय लो  क्यों अँधकार  में बैठे हो ? --- Hariram Regar ************************************* कभी-कभी जीवन में ऐसा समय आता है जब हमें सब कुछ साफ-साफ कह देना चाहिए। जैसे कि एक कविता कहती है: "मुझको जो कहना था वो तो   उस दिन ही सब कह डाला।   अब तुझको भी कुछ कहना हो ...