अमर जवान लाखों ने है लहूँ बहाया , लाखों ने है डंडा खाया , अंग्रेज़ों के उस शासन को जड़ - मूल से काट भगाया सबकी एक अभिलाषा थी “ भारत आज़ाद परिंदा हो ” तुम मरे नहीं हो अमर जवानों , तुम तो दिलों में ज़िंदा हो।। 1 ।। किसी ने गोली खाई थी, तो किसी को फांसी लगायी। कटा दिए थे सिर अपने , भारत की शान बढ़ायी। बड़ी अच्छी थी सोच तुम्हारी, " चाहे हमारी निंदा हो। " तुम मरे नहीं हो अमर जवानों , तुम तो दिलों में ज़िंदा हो।। 2 ।। अपनाई थी स्वदेशी चीजें , विदेशी चीज़ों में आग लगायी। छोड़ दिये सबने दफ्तर सारे , असहयोग की राह अपनायी। साथ दिया था दिल से तुमने , चाहे हिन्दू चाहे मुस्लिम बन्दा हो। तुम मरे नहीं हो अमर जवानों , तुम तो दिलों में ज़िंदा हो।। 3 ।। उरी के हमले से तो अब , हर हिंदुस्तानी का खून खोला था। “ अब नहीं सहन करेंगें इनको ” बच्चा - बच्चा बोला था। ईंट से ईंट बजा देंगे हम, चाहे दुश्मन कितना भी चालाक परिं...
🌿 असमंजस – जब निर्णय कठिन हो हम सबके जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जहाँ मन अनेक दिशाओं में भटकता है। निर्णय लेना आसान नहीं होता, और असमंजस की स्थिति हमें बाहरी सुंदरता और भीतरी भ्रम के बीच झुला देती है। इसी मनःस्थिति को गहराई से चित्रित करती है Hariram Regar की यह मार्मिक कविता – "असमंजस" । यह कविता केवल सुंदर शब्दों की माला नहीं है, बल्कि यह संकोच, संशय और आत्मबोध की यात्रा है। आइए पढ़ते हैं यह सुंदर और विचारोत्तेजक काव्य: असमंजस (Confusion) तकते रहोगे बाग को तुम , कब तलक तकते रहोगे ? बीतते पल-पल दिवस, ये फूल मुरझा जायेंगे। मन की इन गहराइयों में प्रश्न अगणित जाल-से । फूल है या भ्रम की छाया पूछते हर डाल से। बीतते पल गीत जैसे, रूठ जायेंगे अगर । निर्णय की इस मौन बेला में चलो अब संगधर । त्याग दो संकोच सारे, संशयों को आज तुम । मन कहे जो सत्य बोले, सुन लो वो अव्यक्त गुण। अब ना तकना शेष हो यह — पथ सुनिश्चित जान लो। जो बसा है चित्त-गहर में, अब उसे ही मान लो। Composed by: Hariram Regar 🧠 कविता का मर्म – असमंजस से आत्म-निर्णय तक इस कविता में बाग प्रतीक है उन आकर्षक ...