कविता एक ऐसी कला है जो हृदय की गहराइयों से निकलकर सीधे आत्मा तक पहुँचती है। यह शब्दों के माध्यम से भावनाओं का ऐसा विस्तार है जो न केवल हमारे जीवन की सच्चाइयों को उजागर करता है, बल्कि हमें नई दिशा भी प्रदान करता है। इस ब्लॉग पोस्ट में हम जिस कविता पर चर्चा करेंगे, वह कविता कवि हरिराम रेगर की है, जो जीवन के कठिनाईयों के बीच हमें ठहरने और फिर से खड़े होने की प्रेरणा देती है। हरिराम रेगर की यह कविता हमारे जीवन के उन क्षणों को चित्रित करती है जब हम हार और निराशा के कगार पर होते हैं। यह बताती है कि कैसे जीवन में ठहरना ज़रूरी है ताकि हम अपनी गलतियों को सुधारकर फिर से उठ सकें। कविता : रुक जाना तुम इक पल को जब अरमानों में आग लगे और अपना रिश्ता झूठा हो। जब अपनों से ही चोट मिले, विश्वास बिखरकर टूटा हो। जब नमक छिड़क दे ज़ख्मों पर और आह निकलती पल पल को। जब सहनशक्ति का दीप बुझे, तब रुक जाना तुम इक पल को। जब मान तुम्हारा मर जाए, स्वाभिमान बिलखकर रोता हो। हृदय में जब शूल उठे, वो बीज पीर के बोता हो। जब शब्द तुम्हारे मौन बनें, और छोड़छाड़ दो अन्नजल को। जब जीवन का मतलब खो जाए, तब रुक जाना तुम इक पल ...
🌿 असमंजस – जब निर्णय कठिन हो हम सबके जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जहाँ मन अनेक दिशाओं में भटकता है। निर्णय लेना आसान नहीं होता, और असमंजस की स्थिति हमें बाहरी सुंदरता और भीतरी भ्रम के बीच झुला देती है। इसी मनःस्थिति को गहराई से चित्रित करती है Hariram Regar की यह मार्मिक कविता – "असमंजस" । यह कविता केवल सुंदर शब्दों की माला नहीं है, बल्कि यह संकोच, संशय और आत्मबोध की यात्रा है। आइए पढ़ते हैं यह सुंदर और विचारोत्तेजक काव्य: असमंजस (Confusion) तकते रहोगे बाग को तुम , कब तलक तकते रहोगे ? बीतते पल-पल दिवस, ये फूल मुरझा जायेंगे। मन की इन गहराइयों में प्रश्न अगणित जाल-से । फूल है या भ्रम की छाया पूछते हर डाल से। बीतते पल गीत जैसे, रूठ जायेंगे अगर । निर्णय की इस मौन बेला में चलो अब संगधर । त्याग दो संकोच सारे, संशयों को आज तुम । मन कहे जो सत्य बोले, सुन लो वो अव्यक्त गुण। अब ना तकना शेष हो यह — पथ सुनिश्चित जान लो। जो बसा है चित्त-गहर में, अब उसे ही मान लो। Composed by: Hariram Regar 🧠 कविता का मर्म – असमंजस से आत्म-निर्णय तक इस कविता में बाग प्रतीक है उन आकर्षक ...