कब तक सड़ूँगा पिंजरे में, अब जीऊं कैसे इन रंजिशों में। अब ऊब गया हूँ जी करके , दुनिया की इन सब बंदिशों में। मैं तो हवाओ का झौंका था , जाता था हर गांव - शहर। यह थी पहले की हक़ीकत, बदल गयी अब ख्वाहिशों में। तहस - नहस हुआ है, जन - धन इस जहान का। सब कुछ थम - सा गया है, इक विषाणु की गर्दिशों में। घर में बिस्तर थक गया है, बोले तू अब तो निकल। दर्द भरा है दिल में और बाहर पुलिस की मालिशों में। क्या हाल ? ज़रा उनसे भी पूँछो, जो हर दिन कमाते खाते थे। देशबन्दी चक्कर में अब भूखे सोते बिन पर्वरिशों में। हर शख़्स परेशाँ होता है , जब संकट आये दुनिया भर में। स्वार्थ सधा है इसके पीछे, कुछ लोगों की साज़िशों में। यह विषाणु रखे चाहत सिखाने की "मानव देह सब एक है"। पर मानव तो उलझा है , धर्म और जातिगत बंदिशों में। घर पर रहे, स्वस्थ रहे, ख़त्म हो ये महामार...
🌿 असमंजस – जब निर्णय कठिन हो हम सबके जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जहाँ मन अनेक दिशाओं में भटकता है। निर्णय लेना आसान नहीं होता, और असमंजस की स्थिति हमें बाहरी सुंदरता और भीतरी भ्रम के बीच झुला देती है। इसी मनःस्थिति को गहराई से चित्रित करती है Hariram Regar की यह मार्मिक कविता – "असमंजस" । यह कविता केवल सुंदर शब्दों की माला नहीं है, बल्कि यह संकोच, संशय और आत्मबोध की यात्रा है। आइए पढ़ते हैं यह सुंदर और विचारोत्तेजक काव्य: असमंजस (Confusion) तकते रहोगे बाग को तुम , कब तलक तकते रहोगे ? बीतते पल-पल दिवस, ये फूल मुरझा जायेंगे। मन की इन गहराइयों में प्रश्न अगणित जाल-से । फूल है या भ्रम की छाया पूछते हर डाल से। बीतते पल गीत जैसे, रूठ जायेंगे अगर । निर्णय की इस मौन बेला में चलो अब संगधर । त्याग दो संकोच सारे, संशयों को आज तुम । मन कहे जो सत्य बोले, सुन लो वो अव्यक्त गुण। अब ना तकना शेष हो यह — पथ सुनिश्चित जान लो। जो बसा है चित्त-गहर में, अब उसे ही मान लो। Composed by: Hariram Regar 🧠 कविता का मर्म – असमंजस से आत्म-निर्णय तक इस कविता में बाग प्रतीक है उन आकर्षक ...