चाँद से गुफ़्तगू तुम्हारी ये जुल्फें, तुम्हारी अदा, तुम्हारी सूरत पर नीरव सदा। तेरी सूरत व सीरत है ऐसे बनी, देखकर मैं तुझको हुआ हूँ फ़िदा। एक मैं हूँ यहाँ , एक तू है यहाँ, खामोशियों का मंज़र भी यहाँ। मैं खोया हूँ तुझमें, ज़रा इस कदर, अब जाऊँ तो भी मैं जाऊं कहाँ। मैं तुझे देखता , तू मुझे देखती। ये ख़ामोशियाँ अब हमें देखती। चुप क्यों हो बैठी, बोलो तो ज़रा, कुछ लब्ज़ मैं फेंकता,कुछ तुम फेंकती। फिर वो मुस्कुराके मेरी इसी बात पर, देखा था उसने आसमां के चांद पर। हम दोनो की ही नज़रे थी तब चांद पर, उसकी अम्बर में थी और मेरी उस पर। मेरे चांद की नज़रे जब चांद से हटी, फिर खामोशियों की बादलियाँ घटी। कुछ उसने कहा, कुछ मैंने कहा। यूँ ही बातों ही बातों में घड़ियाँ कटी। यूँ ही बातों का चश्का फिर चढ़ने लगा, आस-पास का मौसम बिगड़ने लगा। हमारे हालत ज़रा फिर गंभीर से हुए, कि व्योम का चाँद भी बिछड़ने लगा। वो प्यारा सा चाँद बिछड़ता चला, फिर...
🌿 असमंजस – जब निर्णय कठिन हो हम सबके जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जहाँ मन अनेक दिशाओं में भटकता है। निर्णय लेना आसान नहीं होता, और असमंजस की स्थिति हमें बाहरी सुंदरता और भीतरी भ्रम के बीच झुला देती है। इसी मनःस्थिति को गहराई से चित्रित करती है Hariram Regar की यह मार्मिक कविता – "असमंजस" । यह कविता केवल सुंदर शब्दों की माला नहीं है, बल्कि यह संकोच, संशय और आत्मबोध की यात्रा है। आइए पढ़ते हैं यह सुंदर और विचारोत्तेजक काव्य: असमंजस (Confusion) तकते रहोगे बाग को तुम , कब तलक तकते रहोगे ? बीतते पल-पल दिवस, ये फूल मुरझा जायेंगे। मन की इन गहराइयों में प्रश्न अगणित जाल-से । फूल है या भ्रम की छाया पूछते हर डाल से। बीतते पल गीत जैसे, रूठ जायेंगे अगर । निर्णय की इस मौन बेला में चलो अब संगधर । त्याग दो संकोच सारे, संशयों को आज तुम । मन कहे जो सत्य बोले, सुन लो वो अव्यक्त गुण। अब ना तकना शेष हो यह — पथ सुनिश्चित जान लो। जो बसा है चित्त-गहर में, अब उसे ही मान लो। Composed by: Hariram Regar 🧠 कविता का मर्म – असमंजस से आत्म-निर्णय तक इस कविता में बाग प्रतीक है उन आकर्षक ...