वसन्त यह अरसा बदल रहा है , यह सरसा बन रहा है। यह अपने तन - ज़हन में , सिहरन सा भर रहा है। मैं रहकर इसके आँचल में , खुशियाँ गा रहा हूँ। कागज के कोरे पन्ने पर मैं लिखता जा रहा हूँ। । 1 ।। सुमनों के सुंदर साये में , पेड़ों की पावन छाया में , मैं बैठा हूँ अकेला , हूँ उनसे मिलने आया मैं। पंख लगा उद्भावना के , मैं उड़ता जा रहा हूँ। कागज के कोरे पन्ने पर मैं लिखता जा रहा हूँ। । 2 ।। दॄष्टि डाली दूर तलक , इस फलक से उस फलक , दिख रहा है अलग थलग , छू रहा यह दिल तलक , बैठ करके गीत भ्रमर के , मैं गुन गुना रहा हूँ। कागज के कोरे पन्ने पर मैं लिखता जा रहा हूँ। । 3 ।। कहीं नीमौली निवड़ रही हैं , कहीं मंजरी फूट रही। वृक्षों की टहनी पर देखो , कोमल कलियाँ छूट रही। विलोक्यकर मैं विचित्र द़ृश्य , चित्र इसका बना रहा हूँ। कागज के कोरे पन्ने पर मैं लिखता जा रहा हूँ। । 4 ।। न सर्दी हमको कंपा रही , न गर्मी हमको तपा रही। मैँ उल्फत की बगिय...
🌿 असमंजस – जब निर्णय कठिन हो हम सबके जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जहाँ मन अनेक दिशाओं में भटकता है। निर्णय लेना आसान नहीं होता, और असमंजस की स्थिति हमें बाहरी सुंदरता और भीतरी भ्रम के बीच झुला देती है। इसी मनःस्थिति को गहराई से चित्रित करती है Hariram Regar की यह मार्मिक कविता – "असमंजस" । यह कविता केवल सुंदर शब्दों की माला नहीं है, बल्कि यह संकोच, संशय और आत्मबोध की यात्रा है। आइए पढ़ते हैं यह सुंदर और विचारोत्तेजक काव्य: असमंजस (Confusion) तकते रहोगे बाग को तुम , कब तलक तकते रहोगे ? बीतते पल-पल दिवस, ये फूल मुरझा जायेंगे। मन की इन गहराइयों में प्रश्न अगणित जाल-से । फूल है या भ्रम की छाया पूछते हर डाल से। बीतते पल गीत जैसे, रूठ जायेंगे अगर । निर्णय की इस मौन बेला में चलो अब संगधर । त्याग दो संकोच सारे, संशयों को आज तुम । मन कहे जो सत्य बोले, सुन लो वो अव्यक्त गुण। अब ना तकना शेष हो यह — पथ सुनिश्चित जान लो। जो बसा है चित्त-गहर में, अब उसे ही मान लो। Composed by: Hariram Regar 🧠 कविता का मर्म – असमंजस से आत्म-निर्णय तक इस कविता में बाग प्रतीक है उन आकर्षक ...