ठान ले अपनी मंजिल क्या है? जान ले अपनी राहें क्या है? कहाँ पे तू भटका है बुद्धू ? पूछ ज़रा दिल चाहे क्या ये? बन मत तू बचकाना, मन को न भटकाना, चुन ले उन राहों को, जिन राहों पे तुझको जाना, किन अँधियारों में भटका है ? तेरे दिल में कुछ तो खटका है। तू अटका है , तू भटका है। लगता है थोड़ा सटका है। झटके से उठ, हटके से कर, हिम्मत से काम ले, भटका न कर, मुश्किल से पल्लू झटका न कर तू अटका न कर, तू लटका न कर जिंदगी में हार कर सर पटका न कर रे....... और सुन......... जो मुश्किल का तुझे मटका दे। उसे अपने नीचे लटका दे। दे कान के निचे तपड़ी, उसको पूरा ही तू सटका दे, हाँ झटका दे, हाँ फटका दे, उसको सूली पर अटका दे। माहौल गरम हो तो शांत हो जाओ, जब सर ज़रा चकराए तो एकांत हो जाओ। पर मत भूल ! तुने कुछ ठाना है। मंजिल जरा दूर है। राहों में चलते जाना है। कभी फटे में पैर न फ़साना। क्योंकि अपनी राहें है......... बहुत हार्...
🌿 असमंजस – जब निर्णय कठिन हो हम सबके जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जहाँ मन अनेक दिशाओं में भटकता है। निर्णय लेना आसान नहीं होता, और असमंजस की स्थिति हमें बाहरी सुंदरता और भीतरी भ्रम के बीच झुला देती है। इसी मनःस्थिति को गहराई से चित्रित करती है Hariram Regar की यह मार्मिक कविता – "असमंजस" । यह कविता केवल सुंदर शब्दों की माला नहीं है, बल्कि यह संकोच, संशय और आत्मबोध की यात्रा है। आइए पढ़ते हैं यह सुंदर और विचारोत्तेजक काव्य: असमंजस (Confusion) तकते रहोगे बाग को तुम , कब तलक तकते रहोगे ? बीतते पल-पल दिवस, ये फूल मुरझा जायेंगे। मन की इन गहराइयों में प्रश्न अगणित जाल-से । फूल है या भ्रम की छाया पूछते हर डाल से। बीतते पल गीत जैसे, रूठ जायेंगे अगर । निर्णय की इस मौन बेला में चलो अब संगधर । त्याग दो संकोच सारे, संशयों को आज तुम । मन कहे जो सत्य बोले, सुन लो वो अव्यक्त गुण। अब ना तकना शेष हो यह — पथ सुनिश्चित जान लो। जो बसा है चित्त-गहर में, अब उसे ही मान लो। Composed by: Hariram Regar 🧠 कविता का मर्म – असमंजस से आत्म-निर्णय तक इस कविता में बाग प्रतीक है उन आकर्षक ...