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हटके से कर

ठान ले अपनी मंजिल क्या है?
जान ले अपनी राहें क्या है?
कहाँ पे तू भटका है बुद्धू ?
पूछ ज़रा दिल चाहे क्या ये?

बन मत तू बचकाना,
मन को न भटकाना,
चुन ले उन राहों को,
जिन राहों पे तुझको जाना,

किन अँधियारों में भटका है ?
तेरे दिल में कुछ तो खटका है। 
तू अटका है , तू भटका है।
लगता है थोड़ा सटका है। 


झटके से उठ,
हटके से कर,
हिम्मत से काम ले,
भटका न कर,
मुश्किल से पल्लू 
झटका न कर
तू अटका न कर,
तू लटका न कर 
जिंदगी में हार कर 
सर पटका न कर रे....... 

और सुन......... 

जो मुश्किल का तुझे मटका दे। 
उसे अपने नीचे लटका दे। 
दे कान के निचे तपड़ी,
उसको पूरा ही तू सटका दे,
हाँ झटका दे, हाँ फटका दे,
उसको सूली पर अटका दे। 

माहौल गरम हो 
तो शांत हो जाओ,
जब सर ज़रा चकराए 
तो एकांत हो जाओ। 

पर मत भूल !
तुने कुछ ठाना है। 
मंजिल जरा दूर है। 
राहों में चलते जाना है। 
कभी फटे में पैर न फ़साना।
क्योंकि अपनी राहें है.........  
बहुत हार्ड, बहुत हार्ड। 

तो......... 

झटके से उठ,
हटके से कर,
हिम्मत से काम ले,
भटका न कर,
मुश्किल से पल्लू 
झटका न कर
तू अटका न कर,
तू लटका न कर, 
जिंदगी में हार कर ,
सर पटका न कर। 

ख़तम !!!!!

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