कफ़न बँधे है माथे पर। चाप-तीर, असि-ढाल रखे है। हम शेरों से भी भिड़ जाएँ। शौक गज़ब के पाल रखे है। अरि आँख उठाकर देखे हम पर खून हमारी नस नस में खोले। "हम स्वाभिमान संग जीते है"- इस मिट्टी का कण-कण बोले। हम आन, बान और शान के ख़ातिर अपनी जान भी सहज लुटाते है। हम मर जाएँ, मिट जाएँ लेकिन, इज़्ज़त ना दाव लगाते है। हम ज़ौहर करना सहज समझते, बजाय हम बैरी के हो लें। "हम स्वाभिमान संग जीते है"- इस मिट्टी का कण-कण बोले। अंगुल-बांस के मापन से यहाँ "पृथ्वी" तीर चलाते है। बरदाई का दोहा सुनकर गोरी को मार गिराते है। बक्षीश मिले ना जयचन्दों को पग रिपुओं के डगमग डोले। "हम स्वाभिमान संग जीते है"- इस मिट्टी का कण-कण बोले। यहाँ राणा का भाला भारी है। यहाँ मीरा की भक्ति न्यारी है। माँ पन्ना का त्याग अमोल यहाँ। यहाँ वीर जणे वो नारी है। ना नसीब रहे भले घास की रोटी पर राणा का ना मन डोले। "हम स्वाभिमान संग जीते है"- इस मिट्टी का कण-कण बोले।...
🌿 असमंजस – जब निर्णय कठिन हो हम सबके जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जहाँ मन अनेक दिशाओं में भटकता है। निर्णय लेना आसान नहीं होता, और असमंजस की स्थिति हमें बाहरी सुंदरता और भीतरी भ्रम के बीच झुला देती है। इसी मनःस्थिति को गहराई से चित्रित करती है Hariram Regar की यह मार्मिक कविता – "असमंजस" । यह कविता केवल सुंदर शब्दों की माला नहीं है, बल्कि यह संकोच, संशय और आत्मबोध की यात्रा है। आइए पढ़ते हैं यह सुंदर और विचारोत्तेजक काव्य: असमंजस (Confusion) तकते रहोगे बाग को तुम , कब तलक तकते रहोगे ? बीतते पल-पल दिवस, ये फूल मुरझा जायेंगे। मन की इन गहराइयों में प्रश्न अगणित जाल-से । फूल है या भ्रम की छाया पूछते हर डाल से। बीतते पल गीत जैसे, रूठ जायेंगे अगर । निर्णय की इस मौन बेला में चलो अब संगधर । त्याग दो संकोच सारे, संशयों को आज तुम । मन कहे जो सत्य बोले, सुन लो वो अव्यक्त गुण। अब ना तकना शेष हो यह — पथ सुनिश्चित जान लो। जो बसा है चित्त-गहर में, अब उसे ही मान लो। Composed by: Hariram Regar 🧠 कविता का मर्म – असमंजस से आत्म-निर्णय तक इस कविता में बाग प्रतीक है उन आकर्षक ...