तुझको आगे ही चलना है , तुझको आगे ही रहना है। बस सोच यही रखना तू अपनी , तुझे पीछे कभी न रहना है॥ 1 ॥ तू शुरू से आगे चलता था , तू अब भी आगे चलता है। तू रोक न अपने कदमों को , तुझे आगे भी आगे चलना है॥ 2 ॥ बहकाने वाले खूब मिलेगें , तुझको कभी न बहकना है। हर मुश्किल में तुझे चलना है , हर हालत में तुझे चलना है॥ 3 ॥ मत रोकना अपनी कदम ताल को , अब तेज़ बना तू अपनी चाल को। इतना धीमा मत चलना तू , श्रम से तर कर अपनी भाल को॥ 4 ॥ कितने ही संकट सामने आये, उनसे कभी न डरना है। जो डरता है वो मरता है , तुझे स्वाभिमान संग रखना है॥ 5 ॥ तुझे दर्भ कभी न करना है , मन को दु : ख से नहीं भरना है। इस प्रतियोगिता के सागर में , तुझे ऊपर ही ऊपर तरना है॥ 6 ॥ मत हार किसी से मानना तू , बस कर्म को अच्छा करना है। मत करना तू श्रम मे कंजूसी , इस बात को मन में धरना है॥ 7 ॥ यह दौड़ लगी , यह होड़ लगी , तुझे इसमें अब ...
🌿 असमंजस – जब निर्णय कठिन हो हम सबके जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जहाँ मन अनेक दिशाओं में भटकता है। निर्णय लेना आसान नहीं होता, और असमंजस की स्थिति हमें बाहरी सुंदरता और भीतरी भ्रम के बीच झुला देती है। इसी मनःस्थिति को गहराई से चित्रित करती है Hariram Regar की यह मार्मिक कविता – "असमंजस" । यह कविता केवल सुंदर शब्दों की माला नहीं है, बल्कि यह संकोच, संशय और आत्मबोध की यात्रा है। आइए पढ़ते हैं यह सुंदर और विचारोत्तेजक काव्य: असमंजस (Confusion) तकते रहोगे बाग को तुम , कब तलक तकते रहोगे ? बीतते पल-पल दिवस, ये फूल मुरझा जायेंगे। मन की इन गहराइयों में प्रश्न अगणित जाल-से । फूल है या भ्रम की छाया पूछते हर डाल से। बीतते पल गीत जैसे, रूठ जायेंगे अगर । निर्णय की इस मौन बेला में चलो अब संगधर । त्याग दो संकोच सारे, संशयों को आज तुम । मन कहे जो सत्य बोले, सुन लो वो अव्यक्त गुण। अब ना तकना शेष हो यह — पथ सुनिश्चित जान लो। जो बसा है चित्त-गहर में, अब उसे ही मान लो। Composed by: Hariram Regar 🧠 कविता का मर्म – असमंजस से आत्म-निर्णय तक इस कविता में बाग प्रतीक है उन आकर्षक ...