मैं सुबह-सवेरे साँझ-अँधेरे, तेरा ध्यान लगाता हूँ। हे महाकाल! तेरे चरणों में अपना शीश झुकाता हूँ। हे गरलधर! हे नीलकण्ठ! तुम पूरे विश्व विधाता हो। राख-भभूति से लथपथ हो, भाँग के पूरे ज्ञाता हो। गले में माला शेषनाग की, विष्णु के तुम भ्राता हो। बड़ा सहारा भक्तों का हो, सब याचक तुम दाता हो। सोच यही हर पल, हर क्षण, मैं जमकर धूम मचाता हूँ। हे महाकाल! तेरे चरणों में अपना शीश झुकाता हूँ। हे जटाधारी, कैलाशपति! तुम सृष्टि के महानायक हो। हे स्वरमयी महाकाल अनघ! तुम ताँडव के महागायक हो। तुम गंगाधर, तुम चन्द्रशेखर, तुम त्रिअक्षी, तुम हो अक्षर। हे शूलपाणि! हे उमापति! हे कृपानिधि! हे शिव शंकर! तेरे नाम अनेकों है जग में, उन नाम को मैं जप जाता हूँ। हे महाकाल! तेरे चरणों में अपना शीश झुकाता हूँ। हे व्योमकेश महासेनजनक! हे गौरीनाथ! हे पशुपति! हे वीरभद्र! हे पंचवक्त्र! हे मृत्युंजय! हे पुरारति! हे वामदेव! हे सुरसूदन! हे भुजंगभूषण! हे भगवन! हे प्रजापति! हे शिव शम्भू! हे सोमसूर्यअग्निलोचन! हाँ तू है "हरि", हूँ ...
🌿 असमंजस – जब निर्णय कठिन हो हम सबके जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जहाँ मन अनेक दिशाओं में भटकता है। निर्णय लेना आसान नहीं होता, और असमंजस की स्थिति हमें बाहरी सुंदरता और भीतरी भ्रम के बीच झुला देती है। इसी मनःस्थिति को गहराई से चित्रित करती है Hariram Regar की यह मार्मिक कविता – "असमंजस" । यह कविता केवल सुंदर शब्दों की माला नहीं है, बल्कि यह संकोच, संशय और आत्मबोध की यात्रा है। आइए पढ़ते हैं यह सुंदर और विचारोत्तेजक काव्य: असमंजस (Confusion) तकते रहोगे बाग को तुम , कब तलक तकते रहोगे ? बीतते पल-पल दिवस, ये फूल मुरझा जायेंगे। मन की इन गहराइयों में प्रश्न अगणित जाल-से । फूल है या भ्रम की छाया पूछते हर डाल से। बीतते पल गीत जैसे, रूठ जायेंगे अगर । निर्णय की इस मौन बेला में चलो अब संगधर । त्याग दो संकोच सारे, संशयों को आज तुम । मन कहे जो सत्य बोले, सुन लो वो अव्यक्त गुण। अब ना तकना शेष हो यह — पथ सुनिश्चित जान लो। जो बसा है चित्त-गहर में, अब उसे ही मान लो। Composed by: Hariram Regar 🧠 कविता का मर्म – असमंजस से आत्म-निर्णय तक इस कविता में बाग प्रतीक है उन आकर्षक ...