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उदास धरती माँ

उदास धरती माँ तेरे चेहरे पे झलकती थी खूब ख़ुशी , तू पहनती थी हरी साड़ी ख़ुशी ख़ुशी । आती थी तेरे तन से फूलों की बास । हे धरती माँ ! आज क्यों है तू इतनी उदास ? आम अमरुद बरगद बबूल सब कहा गए ? तेरे सारे अंग आज शिथिल कैसे पड़ गए ? यहां पर आज किसने किया है वास ? हे धरती माँ ! आज क्यों है तू इतनी उदास ? तेरे ऊंचे ऊंचे पर्वतों के सर आज कैसे झुक गए ? चलती हुई नदियों के कदम आज कैसे रुक गए ? आज इन सरोवरों को क्यों लगी है प्यास ? हे धरती माँ ! आज क्यों है तू इतनी उदास ? पहले हवा में महकती थी सुमनों की सुगंध । इसमें आज फैली है प्लास्टिक थैलियों की दुर्गन्ध । कहाँ कर गए तेरे सारे सुमन प्रवास ? हे धरती माँ ! आज क्यों है तू इतनी उदास ? कैसे टूटा है यह   तेरा ओज़ोन कवच ? अब ये प्राणी कैसे पाएंगे बच ? जहाँ सूरज की गन्दी किरणों का फैला है त्रास।  हे धरती माँ ! आज क्यों है तू इतनी उदास ? तेरे ध्रुव खण्ड आज क्यों पिघल रहे ? समुद्री पानी के कदम भूमि पर क्यो...

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असमंजस (Confusion) | Poem | By Hariram Regar

🌿 असमंजस – जब निर्णय कठिन हो हम सबके जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जहाँ मन अनेक दिशाओं में भटकता है। निर्णय लेना आसान नहीं होता, और असमंजस की स्थिति हमें बाहरी सुंदरता और भीतरी भ्रम के बीच झुला देती है। इसी मनःस्थिति को गहराई से चित्रित करती है Hariram Regar की यह मार्मिक कविता – "असमंजस" । यह कविता केवल सुंदर शब्दों की माला नहीं है, बल्कि यह संकोच, संशय और आत्मबोध की यात्रा है। आइए पढ़ते हैं यह सुंदर और विचारोत्तेजक काव्य: असमंजस (Confusion) तकते रहोगे बाग को तुम , कब तलक तकते रहोगे ? बीतते पल-पल दिवस, ये फूल मुरझा जायेंगे। मन की इन गहराइयों में प्रश्न अगणित जाल-से । फूल है या भ्रम की छाया पूछते हर डाल से। बीतते पल गीत जैसे, रूठ जायेंगे अगर । निर्णय की इस मौन बेला में चलो अब संगधर । त्याग दो संकोच सारे, संशयों को आज तुम । मन कहे जो सत्य बोले, सुन लो वो अव्यक्त गुण। अब ना तकना शेष हो यह — पथ सुनिश्चित जान लो। जो बसा है चित्त-गहर में, अब उसे ही मान लो। Composed by: Hariram Regar 🧠 कविता का मर्म – असमंजस से आत्म-निर्णय तक इस कविता में बाग   प्रतीक है उन आकर्षक ...

हम गाँव के देसी छोरे हैं – गांव की मिट्टी से जुड़ी हिंदी कविता | By Hariram Regar

गाँव की मिट्टी का महत्व और उसकी महक भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है। चाहे हम कितने ही आधुनिक हो जाएँ, गाँव की मिट्टी की सौंधी खुशबू और वहाँ की सरलता का कोई मुकाबला नहीं है। गाँवों का जीवन, प्रकृति के साथ सामंजस्य और वहाँ के लोगों का मेहनत से भरा हुआ जीवन, हर किसी को सिखाता है कि सादगी में ही असली ख़ुशी है। हिंदी कविता, जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, ग्रामीण जीवन को बहुत अच्छे से चित्रित करती है। इसी क्रम में हरिराम रेगर  द्वारा रचित कविता "हम गाँव के देसी छोरे हैं" एक ग्रामीण जीवन का अद्भुत चित्रण है। इस कविता में न केवल गाँव की संस्कृति को, बल्कि वहाँ के लोगों की मेहनत, मिट्टी के प्रति लगाव, और जीवन के प्रति उनके सकारात्मक दृष्टिकोण को भी बखूबी दर्शाया गया है। यह कविता गाँव की सरलता और वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य के बीच रहने वाले लोगों की भावनाओं को अभिव्यक्त करती है। हम गाँव के देसी छोरे हैं – कविता खेतों में दौड़ें पग नंगे, मिट्टी में बसती जान अपनी। बाबा के संग बैल जोते थे, सींची थी प्यार से धान अपनी। नदियाँ, बगिया, जंगल, पहाड़, हर दृश्य यहाँ स...

क्यों अँधकार में बैठे हो ? kyo andhakaar me baithe ho ? By Hariram Regar

  ©मुझको जो कहना था वो तो उस  दिन ही सब कह डाला।  अब तुझको भी कुछ कहना हो तो  जल्दी से तुम कह डालो।  कुछ कौड़ी जो है जेब में तेरे  क्या उस पर ही तुम ऐंठे हो ? कुछ बात करो कुछ निर्णय लो  क्यों अँधकार  में बैठे हो ? कुछ राग रहा हो और अगर  वो राग भी तुम अब कह डालो।  और आग भरी हो सीने में तो  उसको भी तुम बाहर निकालो।  क्यों रोज रोज ही खटपट हो  क्यों रोज रोज ही टें-टें  हो? कुछ बात करो कुछ निर्णय लो  क्यों अँधकार  में बैठे हो ? कब तक हाँकोगे उसको? इसकी समय अवधि भी निश्चित है? अरे हाय ! तुम्हारी बेशर्मी  मेरे गाँव में तो ये चर्चित है।  वो बने तुम्हारे आदर्शी  तुम बने उसके घुसपैठे हो।  कुछ बात करो कुछ निर्णय लो  क्यों अँधकार  में बैठे हो ? --- Hariram Regar ************************************* कभी-कभी जीवन में ऐसा समय आता है जब हमें सब कुछ साफ-साफ कह देना चाहिए। जैसे कि एक कविता कहती है: "मुझको जो कहना था वो तो   उस दिन ही सब कह डाला।   अब तुझको भी कुछ कहना हो ...